Chalti Chakki Dekh Ke – Kabir Ke Dohe

Books

hindi dohe

,

hindi poetry

,

kabir amritwani

,

kabir ke dohe

,

sant kabir das

https://kabir-k-dohe.blogspot.com/2021/03/chalti-chakki-dekh-ke.html  
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये । दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ॥ भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं, जब उन्होंने चलती हुई चक्की (गेहूं पीसने या दाल पीसने में इस्तेमाल किया जाने वाला यंत्र) को देखा तो वह रोने लगे क्योंकि वह देखते हैं की किस प्रकार दो पत्थरों के पहियों के निरंतर आपसी घर्षण के बीच कोई भी गेहूं का दाना या दाल साबूत नहीं रह जाती, वह टूटकर या पिस कर आंटे में परिवर्तित हो रहे हैं। कबीर दास जी अपने इस दोहे से कहना चाहते है कि जीवन के इस संघर्ष में... पूरा पढ़े -> https://bit.ly/2Py8NwK